विचार

गंदगी का दंतेवाड़ा यानी डार्क ब्रॉउन कॉरिडोर

देश एन्सिएंट से मॉडर्न मॉर्डन से डिजिटल हो गया। तेजी से होते बदलाव में हम देश की तस्वीर भी कुछ कुछ बदली से देख ही रहे हैं। मॉर्डन इंजीनियरिंग से बने गगनचुम्बी इमारतें, मल्टीलेन हाईटेक सड़केl उन पर दौड़ती एडवांस ऑटोमोबाइल टेक्नोलॉजी से बनी गाड़ियाl

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देश एन्सिएंट से मॉडर्न मॉर्डन से डिजिटल हो गया। तेजी से होते बदलाव में हम देश की तस्वीर भी कुछ कुछ बदली से देख ही रहे हैं। मॉर्डन इंजीनियरिंग  से बने गगनचुम्बी इमारतें, मल्टीलेन हाईटेक सड़केl उन पर दौड़ती एडवांस ऑटोमोबाइल टेक्नोलॉजी से बनी गाड़ियाl जमीन से लेकर आसमान तक आम हो या खास छोटा या बड़ा साधन या उपकरण सब टेक्नोलॉजी से लैस हैंl हर साधन एडवांस टेक्नोलॉजी से लैस है।  जैसे इंसानी नामों के  पहले हम श्रीमान श्रीमती लगाते आ रहे है वैसे ही अब  हर साधनों  या उपकरणों के पहले अब स्मार्ट, प्रो जैसे आदर सूचक शब्दों का प्रयोग हो रहा है  मसलन - स्मार्ट फ़ोन स्मार्ट सिटी, स्मार्ट एप्प, स्मार्ट टीवी, स्मार्ट फ्रीज, स्मार्ट घड़ी लगभग सभी के आगे अब स्मार्ट लग चुका है। इन अनोखे,स्मार्ट,डिजिटल नैनो टेक्नोलॉजी एडवांस टेक्नोलॉजी के शहतीरों से बनी ये भूल भुल्लैया सी दिखने वाली डिजिटल इंडिया के आलावा भी मैं आपको इसी डिजिटल इंडिया के बैकयार्ड में ले चलूँ आप सब गए भी होंगे।

जी हां ये  डिजिटल इंडिया के वो हिस्से  हैं  जहाँ से  पढ़े लिखे लोग मुँह ढककर  और इंग्लिश में गाली देते हुए गुजरते हैं l कुछेक थूककर हिंदी में बड़बड़ाते निकल जाते हैं, और हां मासूम बच्चों का कोई रिएक्शन नहीं होता वो बस निकल जाते हैं। दशकों से एक ही वर्जन, ना प्रो ना एडवांस ना शेप ना साइज कहीं टीले जैसा आकार ,तो कहीं बिखरा सा  भिनभिनाती डिजिटललेस मक्खियां और मच्छर, इन्ही टीलों से अपने लिए निवाले खींचती  हमारी डिजिटललेस गऊ माता अपने ही कुनबे में मारा मारी करते कुत्ते।  इसी डिजिटल अनडिजिटल ढेर में से अपने हिसाब के चीजों को खींचते देश की जीडीपी में अपना अंशदान करते बच्चे और बड़े।  जी हां ये है गंदगी का दंतेवाड़ा जिसे  हम सब डिजिटल इंडिया वासिओं ने अपने  अपार निरंतर  सहयोग से बना बनाया है। हम इसको  नक्सल इलाकों की तरह चिन्हित भी  नहीं कर सकते क्योंकि ये छत्तीसगढ़ झारखण्ड आंध्र प्रदेश में ही नहीं  इस सम्पूर्ण डिजिटल इंडिया के चौराहों,गलियों सड़कों पार्कों में नजर आता है। ये सही है कि कुछेक हो सकता है बहुत भी दंतेवाड़ा बनने को रोकते हैंl मैं खुद भी लम्बे समय से पार्को के दंतेवाड़ा में मोर्चा सँभालते आ रहा हूँ l मैंने ये लेख उस अनुभव के उकसाने पर लिखा है ये भी आप कह सकते हो l

ये कहना बेईमानी होगी की  डिजिटल इंडिया बनाने वाले इस डार्क ब्राउन कॉरिडोर के बारे में फिक्रमंद नहीं हैंl मोदी जी ने तो बाकायदा इसके लिए स्वच्छ भारत नाम से देशव्यापी अभियान भी चलाया हैl देश के नामी चेहरे भी इसके लिए फिक्रमंद हैं। डिजिटल इंडिया वाले इस पर लगभग सौ करोड़ खर्च कर चुके हैंl प्रधानमंत्री खुद इस मुहीम के मुख्य हिस्सा हैंl भारतीय होने के जज्बात में आकर हम इस मुहीम से जुड़े या दंतेवाड़ा ना बनाएं इसके लिए गांधी जी का चश्मा और तिरंगे को दिखाया गया है सड़कों में बड़े- बड़े पोस्टर, टीवी पर नामी चेहरों के साथ विज्ञापन यहाँ तक की नोटों पर भी स्वच्छ भारत चस्पा है। इन सब ताम झाम के बाद क्या इस  डार्क ब्राउन कॉरिडोर का एरिया घटा है मेरे हिसाब से तो नहीं।  सड़कों के किनारे बड़े- बड़े होर्डिंग के नीचे बनता दंतेवाड़ा दिख जाता हैl

हम हक की लड़ाई, फ्रीडम ऑफ़ स्पीच, फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन के नाम पर  हाय- हाय मुर्दाबाद जिंदाबाद के नारे लगाने के लिए सड़कों पर उतर आते हैं, जिम्मेदार इतने कि हाथ में थमी खाली बोतलों को भी डस्टबिन में डालने की जहमत नहीं उठाते।

सफाई पसंद प्राणियों के इंडेक्स में  हम शायद पहले स्थान में काबिज होंगे, पर गैर -जिम्मेदार आदतोँ से लदे हैं।   स्वच्छ भारत अभियान  शायद ये नहीं जताता कि डिजिटल इंडिया वाले कितने जागरूक हैं  बल्कि ये भी दिखाता है कि हमारी गैर जिम्मेदाराना आदतोँ के लिए देश को इतनी बड़ी मुहीम छेड़नी पड़ी l  अपने वीडिओ  ऑडियो विज़ुअल विज्ञापनों से ये दिखाना पड़ा की आप सफाई पसंद जीवों के इंडेक्स के जिम्मेदार मुखिया हो,  इसलिए आदत बदलो। खैर आदत तो जाते- जाते जाती है पर चली जाती है इसी उम्मीद से ये महंगे विज्ञापन इस मुहीम में डटे हैं।  हम भी सफाई पसंद इंडेक्स के ऊँचे मचान पर बैठकर यही ताक रहे हैं कि गंदगी के दंतेवाड़ा यानि डार्क ब्राउन कॉरिडोर का रंग बदलता देख सकें।

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