विचार

भारतवर्ष और इजरायल

दो महीने बाद मोदी इसराइल जाएँगे , और वो भारत के पहले प्रधानमंत्री बनेंगे यहुदियों की धरती पर कदम रखने वाले।

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दो महीने बाद मोदी इसराइल जाएँगे , और वो भारत के पहले प्रधानमंत्री बनेंगे यहुदियों की धरती पर कदम रखने वाले।

मोदी से पहले वाले प्रधानमंत्री क्यों नहीं गए इस बात पर मै चर्चा नहीं करूँगा। और यदि ना जाने की वजह ये थी कि भारत पारंपरिक रूप से फिलीस्तीन का समर्थक रहा है तो ...यहाँ एक प्रश्न जरूर खड़ा होगा , कि क्यों भारत फिलीस्तीन का समर्थक रहा और इसराइल का नहीं ..??

 

1948 में इसराइल एक देश के रूप में विश्व पटल पर आया जिसकी राजधानी यरूशलम बनी। इसके पहले यहुदियों का कोई अपना देश नहीं था। अँगरेजी शासन के अधीन तो वैसे अनेक देश थे जैसे भारत ..परंतु भारतीयों का अपना एक देश था , अरब भी उनके अधीन रहा था पर मुस्लिमों का वो देश था। परंतु यहुदियों का कोई देश नही था। यरूशलम ही वो स्थान है जहाँ से यहुदी धर्म पैदा हुआ था। परंतु कालांतर में यहुदियों का नामोनिशान मिटाने में कोई कसर बाकी रखी नहीं गई थी। इन्हें समाप्त करने का प्रयास सबसे पहले तो इसाईयों ने किया था। ( मैं यहाँ हिटलर का जिक्र नहीं करूँगा क्योंकि उसने केवल 60 लाख यहुदियों का कत्ल किया था जिसमें 15 लाख बच्च भीे थे)। बाद में मुस्लिमों ने भी इन्हें समाप्त करना चाहा था क्योंकि इन्होंने इस्लाम स्वीकार नहीं किया था।

परंतु इनके पुराने दुश्मन फिलीस्तीनियों ने इस्लाम कबूल कर लिया था । फिलीस्तीनियों के साथ इनका पुराना झगड़ा था एक अदद देश के लिए। जो इनका मूल स्थान था वहाँ फिलीस्तीनियों का कब्जा था।

 

मैंने एक कहानी पढ़ी थी हाईस्कूल की अँगरेजी की पुस्तक में , samson and delilah . इस कहानी में सैमसन एक युवा इजराइली है जिसे यहुदियों के देवता ने असीम ताकत दी थी ताकि वो फिलिस्तीनियों के कहर से यहुदियों को बचा सके। पहले तो मुझे यह सिर्फ कहानी लगी थी परंतु बहुत बाद में पता चला कि यह मात एक कहानी नहीं है बल्कि इसका जिक्र पुराने वाले बाइबिल (the old testament) में भी है जो 450 B.C. में यानी ईशा से पहले लिखी गई थी। सनातन धर्म के बाद दुनिया में यदि सबसे पुराना धर्म कोई है तो वो है यहुदी धर्म।

आज से चार हजार साल पहले एक व्यक्ति पैदा हुए थे यरूशलम में , जिनका नाम इब्राहीम था। ये इस धर्म के प्रवर्तक थे , इन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया। इनके अनुयायी यहुदी कहलाये । इन्हीं की वजह से इसाई और इस्लाम भी 'अब्राहमिक रिलिजन" कहलातें हैं। ये एकेश्वर वादी थे और ईश्वर की परम सत्ता में विश्वास रखते थे। कालांतर में यहुदियों के आखिरी पैगंबर मूसा हुए थे। यहाँ तक ..यानी मूसा तक तो ईसाई नाम का कोई धर्म नहीं था। बाद में इन्हीं यहुदियों में यीशु मसीह पैदा हुए जिनके अनुयायी ईसाई कहलाये ।

परंतु यहुदियों ने इन्हें मान्यता नहीं दी ..कहा कि ये ईश्वर का बेटा नहीं है , झूठा और मक्कार आदमी है , ये लोगों को बरगला रहा है। यह हमारा पैगंबर नहीं हो सकता है। क्योंकि हमारा आखिरी पैगंबर तो मूसा थे और अगले का अभी इंतजार है। फिर इन्होंने यीशु को टांग दिया यह कहकर कि यह नामुराद हमारे धर्म के खिलाफ जा रहा है। अब यहीं से इसाई लोगों के मन में यह बैठ गया कि यहुदी हमारे पैगंबर के कातिल हैं और दुश्मनी शुरू हो गई।  

बाद में जब अरब में इस्लाम आया और वे तलवार लेकर दुनिया के लोगों को धर्मांतरित करने लगे तो उनके सामने यहुदी भी पड़े , परंतु यहुदी मरना पसंद किये परंतु इस्लाम स्वीकार नहीं किया। कुछ यहुदी जो फिलिस्तीन के इलाके में थे वे डरकर इस्लाम स्वीकार कर लिए और मुस्लिम बनने के बाद अरबी लोगों से हिम्मत पाकर यहुदियों पर कहर ढाने लगे , यही आज के फिलिस्तीनी हैं।

 इस दौरान अनेक यहुदी भाग कर विश्व के अन्य भागों में बस गए ...पुर्वी यूरोप , रूस , यूक्रेन इनका ठिकाना बना... कुछ जो वहाँ रह गए वो प्रतिकार करते रहेै।

यहुदी अपने धर्म पर अडिग रहे , इनमें राष्ट्रवादिता कूट कूट कर भरी हुई थी । होशियार , शिक्षित , चतुर , हिम्मती एवं बाकियों से संपन्न भी थे वे। हजारों वर्षों तक अपने धर्म की रक्षा करते आए यहुदियों के बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि इन्होंने मरना पसंद किया परंतु ईसाई या मुस्लिम में धर्मांतरित नहीं हुए। 

 

हाल के दशकों में , यानी देश बनने के बाद अरब देशों के समूह को इन्होंने कई बार हराया है।

1948 से लेकर 1973 के बीच ही चार बार भिषण युद्ध हुआ था और चारो बार मुठ्ठी भर  इसराइलियों ने ही युद्ध जीता।

1960 के दशक में भारत में रह रहे लगभग 22000 यहुदी लोगों को इन्होंने अपने देश बुलाकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल किया था , जो महाराष्ट्र और केरल के इलाकों में रहते थे।

इसराइल भारत से उस वक्त भी उतना ही मोहब्बत करता था जब भारत उससे मुँह फेरता था । इसराइल

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