विचार

एंटी रोमियो स्क़्वार्ड़ बनाम प्रोटेस्ट स्क़्वार्ड़

टीवी पर अभिव्यक्ति की आज़ादी के सीधे प्रसारण और उसके उपयोगिता बताये जाने के बाद कम से कम अब हम विरोध करना तो सीख ही गए हैं।

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टीवी पर अभिव्यक्ति की आज़ादी के सीधे प्रसारण और उसके उपयोगिता बताये जाने के बाद कम से कम अब हम विरोध करना तो सीख ही गए हैं। कहीं हाँ का विरोध, कहीं ना का विरोध तो कहीं हाँ, ना दोनों का विरोध। कुछ ना किया तो विरोध, अब कुछ कर दिया तो विरोध I अब तो आये दिन मैं भी विरोध करने लगा हूँ। न्यूज़ चैंनलों पर तो विरोध के लिए बकायदा एक्सपर्ट्स का जत्था मौजूद है I जो किसी काम के विरोध या किसी विरोध के विरोध में अपनी बारीक राय देतें हैं। चलो मुद्दे के साथ यूपी लौट चलें। जहाँ कड़े विरोध के बाद बीजेपी जीत गई, कड़े विरोध के बाद योगी सीएम बन गए, और सीएम ने ‘एंटी रोमियो स्क़्वार्ड़’ बना डाला I जिसका अब कहीं-कहीं पर कड़ा विरोध हो रहा है I ख़ास कर विरोधी सियासी बस्तियों में और कुछेक मीडिया गलियों में भी। खैर विरोध होते रहने से अभिव्यक्ति की आज़ादी की सेहत बनी रहती है, इसलिए विरोध होते रहना चाहिए I

टीवी पर एंटी रोमियो स्क़्वार्ड़ पर आजकल काफी डिबेट हो रहीं हैं विरोध वाले चिल्ला-चिल्ला कर इसकी कमियां गिना रहें हैं, तो कुछेक अरे ठहर जाओ-ठहर जाओ कह कर खूबियां गिना रहें हैं। सुना है संसद में भी एक संसदवासी इसके विरोध में बोल चुकी है I यहाँ विरोध के भी अपने तंदुरुस्त पक्ष हैं, वो इसमें राजनीति,धर्म जाति,सम्प्रदाय सान कर दिखा रहे हैं क़ि देखो ये कितना खराब है I कुछ एक्सपर्ट्स चतुराई और शालीनता से इसमें साहित्य, इतिहास शेक्सपियर को जोड़कर अपने विरोध के रंग को सुनहरा बना देते हैं I इस सुनहरे विरोध के साथ उनका कहना है कि रोमियो तो प्रेम और त्याग का प्रतीक है I इसके साथ हम’ एंटी’ शब्द कैसे लगा सकते हैं और और ना ही ‘रोमियों’ की छबि खराब कर सकते हैं। खैर फिलहाल तो मैं ये सोच रहा हूँ की इन एक्सपर्ट्स का विरोध रोमियो के आगे एंटी लगाने से है या पुरे ‘एंटी रोमियो स्क़्वार्ड़’ के मैकेनिज्म पर। इसके पक्षधरों और घटकों का इसमें सपाट पक्ष ये है क़ि इसको महिलाओं के साथ बढ़ती छेड़खानी और अन्य संगीन उत्पीड़न रोकने के लिए निजात किया गया है। वहीं इस मुहिम के मुख्य स्टेक होल्डर्स का भी यही कहना है कि ये हमारी सुरक्षा के लिहाज से उचित कदम है I ये बात अलग है कि अभी-अभी जो एंटी रोमियो स्क़्वार्ड़ के कहने पर जो उठक-बैठक लगा कर आया है, उसका इस मुहीम पर कुछ कहना नहीं है। मेरे अपने तटस्थ मत का भी यही कहना है कि इससे डरी सहमी और आक्रोशित महिलाओं को एक सुरक्षित होने का ढांढस मिला है। जो एक अच्छी बात हो सकती हैं। हमें आदतन विरोध करने की लत से उभर कर इस मुहीम के टैक्निकल, टेक्सचुअल और ऑपरेशनल खामियां, अगर हों तो पक्ष वालों को मित्रवत सुझाव देना चाहिए I

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