विचार

एक माँ ने अपने बेटे को आई0ए0एस बनाने के लिए शमसान घाट पर दाह संस्कार कराने में गुजार दिए 80 साल!

एक मां जिसने अपने बच्चों की परवरिश और शिक्षा के लिए जिंदगी के 80 साल केवल शमशान घाट पर दाह संस्कार कराने और चिताएं जलाने में गंवा दिए। कुरीतियों और परम्पराओं को ठोकर मार, उसने दुनियां के सामने एक मिशाल पेश की।

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इलाहाबाद. एक मां जिसने अपने बच्चों की परवरिश और शिक्षा के लिए जिंदगी के 80 साल केवल शमशान घाट पर दाह संस्कार कराने और चिताएं जलाने में गंवा दिए। कुरीतियों और परम्पराओं को ठोकर मार, उसने दुनियां के सामने एक मिशाल पेश की। बेटों को पढ़ा कर आईएएस बनाया लेकिन रोटी देने वाले पेशे से मुंह नहीं फेरा। रसूलाबाद शमशान घाट उन्हीं के द्वारा बनाया हुआ है। इलाहाबाद के साथ ही पूरी दुनिया में उन्हें महराजिन बुआ के नाम से जाना जाता है। आज वो मां तो नहीं है लेकिन बेटे उनकी परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। 

गुलाब महराजिन उर्फ महराजिन बुआ इलाहाबाद के चकिया में रहती थी। पिता लक्ष्मी नारायण मिश्र पुरोहित थे। मिश्र की सात संताने थी। महराजिन सबसे बड़ी थी। उन्हें बचपन से ही लड़कों की तरह दिखने का शौक था। वो सुबह रोज करसत करती थीं। 9 साल की उम्र में उनकी शादी अरैल के शंकर जी त्रिपाठी के साथ हुई थी। 11 साल की उम्र में उनका गवना हुआ। उसके कुछ दिन बाद ही उनके पिता का देहांत हो गया। महराजिन बुआ की परंपरा को आगे बढ़ा रहे उनके सबसे छोटे बेटे जगदीश त्रिपाठी ने बताया कि पिता के देहांत के बाद उनके यहां काम करने वाले लोग पुरोहितगिरी पर कब्जा जमाने लगे। जिसके कारण घर की स्थिति काफी खराब हो गई। इसकी जानकारी जब मां यानि महराजिन बुआ को हुई तो उन्होंने अपने ससुराल वालों के सामने अपने माइके की समस्या रखी। ससुराल वालों ने उन्हें घर आने की इजाजत दे दी। यहां आ कर बुआ ने जब पुरोहित का धंधा खुद चलाने का निर्णय लिया तो विरोधियों ने उन्हें काम करने से रोका। रसूलाबाद घाट बनाया और चितांए जला कर अपने अपने परिवार के साथ बच्चों को भी पाला। अधिकारी बनने के बाद कई बार उनके बच्चों ने चिता जलाने का धंधा बंद करने के लिए भी कहा लेकिन उन्होंने यह कहते हुए बंद करने से मना कर दिया कि जिसने तुम लोगों को इस लायक बनाया, मेरी तमन्ना पूरी की। आज उसका साथ नहीं छोड़ सकती। अंतिम सांस तक चिता जलाने का काम करती पहूंगी। 2002 में करीब 91 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया। महराजिन बुआ की स्मृति में एक छोटा समाधि स्थल बनवाया गया है। 
परम्परा को तोड़ विरोधियों को दिया करारा जवाब
महराजिन बुआ ने जब पुरोहित का धंधा शुरू किया तो लोग इसका कड़ा विरोध करने लगे। उन्होंने सबसे पहले दारागंज घाट पर दाह संस्कार करना शुरू किया। उसनके विरोध यह कहते हुए विरोध करते कि दाह संस्कार महिलाओं का काम नहीं हैं। ये तो परम्परा को तोड़ने वाली बात हो गई। लगातार विरोध होने पर उन्होंने दारागंज घाट पर दाह संस्कार करना छोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने रसूलाबाद में दाह संस्कार के लिए खुद से घाट बनाया। शुरू में रसूलाबाद घाट के चारो ओर जंगल था। महराजिन बुआ ने घाट तक जाने का रास्ता सही किया। साथ ही लकड़ी की टाल भी लगवाई ताकि लोगों को दाह संस्कार में कोई परेशानी ना हो। प्रारंभ में महराजिन केवल कर्मकांड ही कराती थी। वहीं बाद में खुद ही चिता को जलाना भी शुरू कर दिया। उनके इस हौसले को देखने वाले बस देखते रह जाते। धीरे-धीरे उनके घाट पर दाह संस्कार कराने वालों की भीड़ होने लगी। 
13 लाख 84 हजार कराए दाह संस्कार
महराजिन बुआ ने अपनी जिंदगी के 80 साल शमशाम घाट में चिताओं को आग लगाने और दाह संस्कार कराने में गुजार दिए। उनके बेटे जगदीश बताते हैं कि मां ने अपने जीवन काल में 13 लाख 84 हजार से भी ज्यादा दाह संस्कार कराए हैं। सन 2002 में जब 91 साल की उम्र में उनकी मां का देहांत हुआ था तो बीबीसी तक के लोग यहां आए थे। मां के निधन की खबर इलाहाबाद के साथ देश दुनियां में आग की तरह फैली थी। जिसे लेकर सब काफी दुखी थे। 

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