धार्मिक

आतंक एक चेहरे अनेक

पिछले दिनों जम्मू -कश्मीर में रह-रह कर दिखते आईएसआईएस के झंडे , धार्मिक कट्टरता रखने वाले कुछ लोगों का परोक्ष या वैचारिक तौर पर इस संगठन के तरफ झुकाव ऐसी घटनाओं से हिंदुस्तान भली भांति वाकिफ था।

Photo: Google

पिछले दिनों जम्मू -कश्मीर में रह-रह कर दिखते आईएसआईएस के  झंडे , धार्मिक कट्टरता रखने वाले कुछ लोगों का परोक्ष या वैचारिक  तौर पर इस संगठन के तरफ झुकाव ऐसी घटनाओं से हिंदुस्तान भली भांति वाकिफ था।  कल अचानक ही  आईएसआईएस  का मेड इन इंडिया वाला  चेहरा भी सामने आ गया।  बकौल नॉन-डिफेंस एक्सपर्ट मैं  इस घटना की ब्यापकता और तकनीकी पहलू पर नहीं जा सकता ,पर आभासी खतरे  पर  को कोई भी हिंदुस्तानी अपनी राय  दे सकता है

नक्सलवाद, आंतकवाद जैसे गम्भीर समस्याओं से जूझते हिंदुस्तान  को अब शायद  एक और कट्टर और क्रूर उभरते चेहरे के बारे में भी सोचना पड़ सकता है, मैं ‘सोचना’  शब्द  इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूँ क्योंकि हमारा लचर क़ानून,हाइपर एक्टिव सोशल एलिमेंट सीधे एक्शन की इजाजत नहीं देता I

हम आतंक के कुछ पुराने कुनबे और अब एक नयी जमात से निबटने के लिए  कितने तैयार है ये आंतरिक सुरक्षा का मसला है, मैं सवाल भी नही उठा रहा।  पर हम सामाजिक तौर पर कितने एकजुट है बेशक मैं इस पर सवाल उठा रहा हूँ , उठाऊँ भी क्यों नहीं- इसी हिंदुस्तान की छाती पर खड़े होकर लोग अफ़ज़ल के हिमायत में आज भी लोग नारे लगा रहे हैं। बुरहान को शहीद कहने में भी गुरेज नहीं करते I संशय है कि इस मसले पर भी  हम एक सीध में खड़े नहीं दिखाई देंगे, और बड़ी चतुराई से एक्वेल राइट,एक्वेल जस्टिस , फ्रीडम ऑफ़ स्पीच, फीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन जैसे कई मास्टर कार्ड  और कुछ नए स्लोगन लेकर सड़कों   पर उतर जाएंगे I  देखते ही देखते आतंक की लड़ाई सोशल जस्टिस की लड़ाई बन जायेगी I  

मैं वापस इस मल्टी फेसेस आतंकवाद से निपटने की चुनौती और चर्चा  को सम्मान सहित अपने डिफेंस एक्सपर्टस के लिए छोड़े जा रहा हूँ।  उम्मीद है हम भी कम से कम  आतंकवाद  जैसे मुद्दों पर एक चेहरे के साथ एक सीध में नज़र आएंगे I  

To Top